Priyanka Pandit Instagram – Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 28
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते
हे महाबाहु अर्जुन! तत्त्वज्ञानी आत्मा की पहचान गुणों और कर्मों से भिन्न करते हैं वे समझते हैं कि ‘इन्द्रिय, मन, आदि के रूप में केवल गुण ही हैं जो इन्द्रिय विषयों, (गुणेषु) में संचालित होते हैं और इसलिए वे उनमें नहीं फंसते।
‘जो अहंकार से मोहित होकर भूल से स्वयं को शरीर मान लेते हैं और स्वयं को कर्ता समझने लगते हैं।’ इस श्लोक में तत्त्ववित्तु या सत्यदर्शियों के संबंध में व्याख्या की गयी है। जिसका तात्पर्य यह है कि वे अहंकार को त्याग कर शारीरिक चेतना से मुक्त हो जाते हैं और जड़ शरीर से अपनी आध्यात्मिक पहचान का भेद जानने में समर्थ हो जाते हैं। इसलिए वे अपने लौकिक कर्मों के लिए स्वयं को कर्ता मानने के छलावे में नहीं आते और अपेक्षाकृत सभी क्रियाओं को तीन गुणों का लक्षण मानते हैं। | Posted on 25/Apr/2024 12:36:28
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