हे किशोरी जू। मेरे द्वारा क्या कुछ किये जाने पर आप मुझ पर प्रसन्न हो सकती हो ? हे कृपानिधि! आप मुझे वह तरकीब बतायें, जिसके करने से आप प्रसन्न हो जायेंगी। मेरे वश में जहाँ तक होगा, मैं उसे करने का पूरा प्रयास करूंगी । [1] मेरी नज़र में तो आपको प्रसन्न करने का कोई उपाय समझ में नहीं आ रहा है। मेरा मन और मेरी बुद्धि तो कोई युक्ति सोचते-विचारते तुरन्त थकान का अनुभव करने लगती है। श्रहित भोरोसखी जी कहती है कि हे लाड़ली तो सहज रूप से कृपा करने वाली हैं, तो फिर आप स्वयं ही इसका उपाय क्यों नहीं बता देती हो ? [2]
Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 41 तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ। पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् इसलिए हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! प्रारम्भ से ही इन इन्द्रियों को नियंत्रण में रखकर कामना रूपी शत्रु का वध कर डालो जो पाप का मूर्तरूप तथा ज्ञान और आत्मबोध का विनाशक है। इस श्लोक में अब श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि उस काम वासना पर कैसे विजय प्राप्त की जा सकती है जो सभी बुराइयों की जड़ है और मानव चेतना के लिए घातक है। काम वासना को बुराइयों का भण्डार बताते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रारम्भ से ही इन्द्रियों के विषय भोगों पर नियंत्रण रखने के लिए कहते हैं। इनकी उत्पत्ति की अनुमति देना हमारे कष्टों का मूल कारण है जबकि इनका दमन करना शांति का मार्ग है।
Happy 6 mnth raja beta kunj😍
My fav place 😍❤️bs yhi rehna he sadev ❤️aapke charnarvind ki seva hi mera dharm he nath ❤️
Meri pyari laddo 😊 What a beautiful song @legit_pj
ऐसौ स्वपन मोहि अति भावै । नैंन समीप मोहिनी मूरत, मंद – मंद मुसिकावै ॥ [1] कोटि चंद छबि सुंदर आनन, रूप सुधा बरसावै । ‘भोरी’ रंग भरी अलबेली, हिय में आइ समावै ॥ [2] – श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (112) हे प्यारी जू [श्री राधा]! मेरे मन को ऐसा स्वप्न देखना बहुत अच्छा लगता है, जिसमें मन को मोहने वाली आपकी सुंदर छवि, मेरी आँखों के आगे आकर खड़ी हो जाए और मंद मंद मुस्कुराए । [1] करोड़ों चंद्रमाओं की कांति के समान आपकी सुंदर छवि, रूप रस की सुंदर वर्षा कर रही हो और मेरे ह्रदय में आकर समा जाए । [2]
ऐसौ स्वपन मोहि अति भावै । नैंन समीप मोहिनी मूरत, मंद – मंद मुसिकावै ॥ [1] कोटि चंद छबि सुंदर आनन, रूप सुधा बरसावै । ‘भोरी’ रंग भरी अलबेली, हिय में आइ समावै ॥ [2] – श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (112) हे प्यारी जू [श्री राधा]! मेरे मन को ऐसा स्वप्न देखना बहुत अच्छा लगता है, जिसमें मन को मोहने वाली आपकी सुंदर छवि, मेरी आँखों के आगे आकर खड़ी हो जाए और मंद मंद मुस्कुराए । [1] करोड़ों चंद्रमाओं की कांति के समान आपकी सुंदर छवि, रूप रस की सुंदर वर्षा कर रही हो और मेरे ह्रदय में आकर समा जाए । [2]
Happy birthday shyam sundar 🥰 mera pyara bhai🎂❤️
बृजाधिराज-नन्दनाम्बुदाभ गात्र चन्दना-नुलेपगंधवाहिनीं भवाब्धिबीजदाहिनीम् । जगत् त्रये यशस्विनीं लसत्सुधापयस्विनीं-भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरंतमोहभंजनीम् ॥ [1] ब्रजराजनंदन श्री कृष्ण के मेघश्याम अंग पर अनुलेपित चन्दन की सुगंध को लेकर बहने वाली, बार-बार जन्म की कारण अविद्या को जला देने वाली, तीनों लोकों में फैले हुए निर्मल यश वाली, अमृत जैसे जल वाली तथा अति कठिनाई से नष्ट होने वाले मोह का नाश करने वाली कलिंदनंदिनी श्री यमुना जी का मैं भजन करता हूँ । [1] श्री यमुनाष्टक – श्री हित हरिवंश महाप्रभु
Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 39 आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च हे कुन्ती पुत्र! इस प्रकार ज्ञानी पुरुष का ज्ञान भी अतृप्त कामना रूपी नित्य शत्रु से आच्छादित रहता है जो कभी संतुष्ट नहीं होता और अग्नि के समान जलता रहता है। यहाँ श्रीकृष्ण ने काम या वासना की हानिकारक प्रकृति को और अधिक सुस्पष्ट किया है। काम का अर्थ ‘इच्छा’, दुष्प्रेरणा का अर्थ ‘अतृप्ति’ और अनलेन का अर्थ ‘अग्नि के समान’ है। कामनाएँ बुद्धिमान पुरूष के विवेक पर विजय पा लेती हैं और इनकी तुष्टि के लिए उन्हें लुभाती है। कामना रूपी अग्नि को शमन करने का जितना भी अधिक प्रयास किया जाए यह उतनी ही और अधिक भीषणता से भड़कती है।
Beautiful summer dress from @_kanha__lovers_ Poshak seva from @vanshh__5850 thanks itne sundar poshak gift krne ke liye
Koi nahi cute mere Shyam Sundar jesa 😍🥰🤗❤️🧡💛 Happy Birthday Shyam Sundar Babu🎂
Hare Krishna ratri 🙌🧿❤️
Shringar seva❤️
Krishna ki sharnagati le loh @hari_sevak7
Bhagavad Gita: Chapter 3, Verse 40 इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् इन्द्रिय, मन और बुद्धि को कामना की प्रजनन भूमि कहा जाता है जिनके द्वारा यह मनुष्य के ज्ञान को आच्छादित कर लेती है और देहधारियों को मोहित करती है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण व्यक्त करते हैं कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि वह स्थान हैं जहाँ से काम वासना आत्मा पर आधिपत्य जमाने का प्रयास करती है। काम वासना के प्रभाव के अंतर्गत इन्द्रियाँ इन्द्रिय विषय भोगों की कामना करती हैं और इन्द्रियाँ मन को सम्मोहित करती हैं। मन बुद्धि को भ्रमित करता है तथा बुद्धि अपनी विवेकी शक्तियाँ खो देती है। जब बुद्धि पर आवरण पड़ जाता है, तब मनुष्य मोहवश होकर वासनाओं का दास बन जाते हैं और उनकी तुष्टि हेतु सब कुछ करने को तत्पर रहते हैं। इन्द्रियाँ मन और बुद्धि नामक तत्त्व अपने आप में किसी प्रकार से बुरे नहीं होते। यह सब भगवद् प्राप्ति के प्रयोजन हेतु हमें भगवान द्वारा प्रदान किए गये हैं। किन्तु हम काम वासनाओं को इन पर कई रूपों में इनकी घेराबंदी करने की अनुमति देते हैं। अब हमें इन्हीं इन्द्रियों, मन और बुद्धि को आत्म उत्थान के लिए प्रयोग करना चाहिए। ऐसा किस प्रकार से किया जाए, इसे श्रीकृष्ण अगले श्लोक में स्पष्ट करेंगे।
Birthday poshak seva @vanshh__5850 Thanks @_kanha__lovers_ for beautiful poshak and Jwallery
Vrindavan Chandrodaya mandir 🧿bahot hi sundar mandir he 🙏 tallest temple bn raha he hamare prabhu shri krishna ka shri dham Vrindavan main 🙏 3 din ka bahot sundar creators retreat program organise kiya gaya tha @vcmvrindavan dwara Bahot kuch sikha Bahot anand aaya 🙏 agr Vrindavan aate he toh Chandrodaya mandir aana bilkul na bhule🧿
प्रथम हृदै श्रद्धा श्रद्धा जो करै , आचारजनि* जाइ अनुसरै । जहाँ – जहाँ हरिवंश के ॥ रसिकनि की सेवा जब होइ , प्रीति सहित बूझहु सब कोइ । कौन धर्म हरिवंश कौ ॥ कौन सु रीति कौन आचरन , कौन सुकृत जिहिं पावै शरन । क्यौं हरिवंश कृपा करें ॥ तब सब धर्म कह्यौ समुझाइ , संतत सकल सुनहु चित लाइ । श्री हरिवंश प्रताप जस ॥ भावार्थ – ( यदि प्रभु कृपा से किसी के ) हृदय में ( इस धर्म के प्रति ) श्रद्धा का प्राथमिक उदय हो , तो वह जाकर श्रीआचार्य चरणों का अनुसरण करे । कौन से आचार्य ? श्रीहरिवंशचन्द्र के ( धर्मधारक एवं गोत्रज ) ; कहाँ पावे उन्हें ? जहाँ कहीं भी मिलें वे ; उन्हीं की शरण ले । जब उन आचार्यों – रसिकों की सेवा से उन्हें पूर्ण प्रसन्न करले तब उनसे प्रीति – पूर्वक पूछे कि श्रीहरिवंश का धर्म क्या है ? उस धर्म की रीतियाँ हैं क्या ? उनका आचरण कैसे किया जाय ? वह कौन – सा सत्कार्य है जिससे श्रीहरिवंश की चरण – शरण मिलती है ? और हम पर श्रीहरिवंश कैसे कृपा करेंगे ? श्रद्धालु के इतना पूछने पर वे कृपालु रसिक आचार्य गण धर्म का पूर्ण स्वरूप समझा कर कहेंगे , उसे आप सब लोग भी चित्त लगाकर श्रवण कीजिये वह श्रीहरिवंश का प्रताप – यश ही तो है । श्रीहित नाम प्रताप ( तृतीय प्रकरण ) पद – 1
Beautiful Vrindavan Chandrodaya mandir Tallest temple in the world , iconic structure in the holy land of Vrindavan ❤️ Temple phase 1 inauguration on November 2024
प्रथमहिं सेवहु गुरु के चरन , जिन यह धर्म कह्यौ सब करन । नाम – प्रताप बताइयो ।। जो श्री हरिवंश नाम अनुसरहु , निशिदिन गुरु को सेवन करहु । सकल समर्पन प्रान – धन ।। गुरु – सेवा तजि करहिं जे बानि , यहै अधर्म यहै सब हानि । कानि न रसिकनि में रहै ।। गुरु – गोविन्द न भेद कराइ , संतत सकल सुनहु चित लाइ । श्री हरिवंश – प्रताप जस ।। भावार्थ – ( इस प्रकार पूर्व कथित रीति से ) सर्व प्रथम श्रीगुरु चरणों का सेवन करो जिन्होंने इस ( हित ) धर्म के पालन करने के लिये आज्ञा दी और जिन्होंने नाम का प्रताप बताया है । यदि तुम वास्तव में श्रीहरिवंश नाम का अनुसरण ( आश्रय ) कर रहे हो तो तुम्हें चाहिये कि अपने प्राण , धन और सर्वस्व के समर्पण पूर्वक दिन रात श्रीगुरुदेव का ही सेवन करो । जो लोग श्री गुरु – सेवा को छोड़कर अन्य साधनों में मन लगाते हैं , यही उनका अधर्म और बड़ी भारी हानि है । ऐसे हठशील अधर्मी की रसिकों में कोई प्रतिष्ठा या मर्यादा मान नहीं रह पाता । अतएव सच्चे उपासक का धर्म है कि वह श्री गुरुदेव एवं गोविन्द में कोई भेद न देखे न करे । श्रीसेवक जी कहते हैं- रसिको । आप निरन्तर चित्त लगाकर श्रीहरिवंश का प्रताप – यश सुनिये । पद – 3 श्रीहित नाम प्रताप ( तृतीय प्रकरण )
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